हमारे देश में संकट के सर पर आ खड़े होने के बाद उसका समाधान ढूंढ़ने की अजीब परंपरा है , हम कुआं उस वक़्त खोदना शुरू करते हैं जब प्यास लगी होती है और यह देश की सरकार और आम नागरिक दोनों पर समान रूप से लागू होता है। 28 फरवरी को अमरीका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले के बाद जिस तरीके से सरकार ने देश में पेट्रोल और डीजल की कमी पूरा करने के लिए भाग दौड़ शुरू की और देश में पेट्रोलियम पदार्थों का संकट पैदा नहीं होने दिया वह देखने को तो अच्छा और काबिले तारीफ लगता है लेकिन सोचिए यदि हम भी इस युद्ध को लेकर चीन की तरह निश्चिन्त हो सकते।
जी हाँ चीन में इस युद्ध के कारण पेट्रोलियम और गैस को लेकर कोई बड़ा संकट खड़ा नहीं हुआ। हालाँकि हमारी और चीन की आबादी लगभग एक जैसी है लेकिन चीन और भारत में मूल भूत अंतर क्रूड पर निर्भरता का है। चीन ने पिछले 15 साल में इलेक्ट्रिक वाहनों के मामले में इतनी प्रगति कर ली है कि अब उसे दुनिया के किसी भी हिस्से में जंग के कारण तेल की आपूर्ति बाधित होने से कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता जबकि हमारे सामने ऐसी स्थिति में न सिर्फ नागरिकों को गैस और पेट्रोल की सप्लाई सुनश्चित करने की चुनौती खड़ी हो जाती है बाकि अपनी मुद्रा को डालर के मुकाबले संभालने का संकट भी खड़ा हो जाता है। देश की सरकार ईरान-अमरीका युद्ध के बाद वेनजुएला और रूस से तेल की सप्लाई लेने के अलावा कनाडा और अमरीका से भी तेल खरीदा लेकिन ज़रा सोचिए यदि आज देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन होता तो हमें इतनी भाग दौड़ नहीं करनी पड़ती ।
खैर अब तो ईरान-अमरीका की यह जंग समाप्त होने के किनारे है और कुछ दिनों में स्ट्रेट आफ होर्मुज खुल जाएगा और दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य हो जाएगी लेकिन इस संकट को हमें एक सबक की तरह लेना चाहिए और अगले 10 साल में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रमोट करने के लिए काम करना होगा। चीन में आज करीब 35 प्रतिशत वाहन इलेक्ट्रिक हैं जबकि भारत में महज 4 से 5 प्रतिशत वाहन भी इलेक्ट्रिक नहीं है। इसके लिए सरकार को वित्तीय प्रोत्साहन देने चाहिए और इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स छूट के अलावा इस तरह के वाहनों पर मिलने वाली डेप्रिसिएशन बढ़ानी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग टैक्स बचाने के लिए इस तरह के वाहन खरीद सकें। जितनी ज्यादा छोटी कारें इलेक्ट्रिक होंगी इनमे उतनी ही जनता की भागीदारी बढ़ेगी।
सरकार पेट्रोलियम की खपत कम करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 30 प्रतिशत तक करने जा रही है लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं है छोटी अवधि में आप इस से कुछ फायदा ले सकते हैं लेकिन ज़रा सोचिए जिस गन्ने से एथेनॉल बनेगा उसे उगाने के लिए हमें अपने नेचुरल रिसॉर्स पानी का इस्तेमाल करना पड़ेगा और उस फसल को पालने के लिए हमें फटलाइजर तो फिर इम्पोर्ट ही करना पड़ेगा ऐसे में यह ज्यादा समझदारी वाला फैसला नहीं लगता बल्कि इस तरह के प्रॉजेक्ट पर लगने वाे पैसे से यदि इलेक्ट्रिक वाहनों पर टैक्स छूट दी जाए तो बेहतर और अंबी अवधि वाला समाधान हो सकता है।
इसके साथ ही लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस ( एल पी जी ) पर निर्भरता कम करने के लिए देश में इंडक्शन चूल्हे के प्रयोग को प्रोत्साहित करना होगा। इंडक्शन चूल्हे को प्रमोट करने के लिए देश में इस प्रकार के चूल्हे के डिजाइन भारतीय बर्तनों की तरह बनाने पड़ेंगे क्योंकि मौजूदा चूल्हे निचे से स्पॉट होने के कारण भारतीय बर्तनों के डिजाइन के साथ पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। यही कारण है कि भारत में इन चूल्हों का इस्तेमाल नहीं हो रहा जबकि चीन के शहरों में इस प्रकार के चूल्हे आम इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। हमें इन दोनों प्रकार के क़दमों को उठाते हुए अगले 10 साल में देश को एनर्जी सेक्योरिटी की तरफ ले जाने की जरूरत है ताकि जब अगली बार इस तरह की जंग से एनर्जी सप्लाई में बाधा आए तो भारत इसके लिए तैयार हो।

ईरान-अमरीका जंग से सबक लेने की जरूरत, भारत को एनर्जी सेक्टर में आत्म निर्भर बनाना होगा
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Writer & Journalist


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